शनिवार, 28 जुलाई 2012

33. जटाशंकर उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

33. जटाशंकर  उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

 जटाशंकर पढाई कर रहा था। पढाई में मन उसका और बच्चों की भाँति कम ही लगता था। पिताजी बहुत परेशान रहते थे। बहुत बार डाँटते भी थे। पर वांछित परिणाम आया नहीं था। वह बहाना बनाने में होशियार था।
आखिर पिताजी ने तय कर लिया कि वे अब उसे डांटेंगे नहीं, बल्कि प्रेम से समझायेंगे।
उन्होंने अपने बच्चे को अपने पास बिठाकर तरह तरह से समझाया कि बेटा! यही उम्र है पढाई की! मूर्ख व्यक्ति की कोई कीमत नहीं होती।
दूसरे दिन उन्होंने देखा कि बेटा पढ तो रहा है। पर कमर पर उसने रस्सी बांध रखी है।
यह देखकर पिताजी बडे हैरान हुए।
उन्होंने पूछा- जटाशंकर! यह तुमने रस्सी क्यों बाँध रखी है?
-अरे पिताजी! यह तो मैं आपकी आज्ञा का पालन कर रहा हूँ।
-अरे! मैंने कब कहा था कि रस्सी बांधनी चाहिये!
-वाह पिताजी! कल ही आपने मुझे कहा था कि बेटा! अब खेलकूद की बात छोड और कमर कस कर पढाई कर!
सो पिताजी कमर कसने के लिये रस्सी तो बांधनी पडेगी न!
पिताजी ने अपना माथा पीट लिया।
शब्द वही है, पर समझ तो हमारी अपनी ही काम आती है। कहा कुछ जाता है, समझा कुछ जाता है, किया कुछ जाता है! ऐसा जहाँ होता है, वहाँ जिंदगी दुरूह और कपट पूर्ण हो जाती है। मात्र शब्दों को नहीं पकडना है... भावों की गहराई के साथ तालमेल बिठाना है।

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

32 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

32 जटाशंकर       -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

जटाशंकर सेना में ड्राइवर था। घुमावदार पहाड़ी रास्ते में एक दिन वह ट्रक चला रहा था कि उसकी गाड़ी खाई में गिर पडी। वह तो किसी तरह कूद कर बच गया परन्तु गाडी में रखा सारा सामान जल कर नष्ट हो गया।
सेना ने जब इस घटना की जाँच की तो सबसे पहले जटाशंकर से पूछा गया कि तुम सारी स्थिति का वर्णन करो कि यह दुर्घटना कैसे हुई।
जटाशंकर हाथ जोड कर कहने लगा- अजी! मैं गाड़ी चला रहा था। रास्ते में मोड बहुत थे। गाड़ी को पहले दांये मोडा कि बांये हाथ को मोड आ गया। मैंने गाडी को फिर बांये मोडा। फिर दांये मोड आ गया। मैंने दांयी ओर गाडी को काटा। कि फिर बांयी ओर मोड आ गया, मैंने फिर गाडी को बांयी ओर मोडा। दांये मोड, फिर बांये मोड, फिर दांये मोड, फिर बांये मोड, ऐसे दांये से बांये और बांये से दांये मोड आते गये, मैं गाडी को मोडता रहा! मैं गाडी को मोडता रहा और मोड आते रहे। मोड आते रहे... मैं मोडता रहा! मैं मोडता रहा... मोड आते रहे।
एक बार क्या हुआ जी कि मैंने तो गाडी को मोड दिया पर मोड आया ही नहीं! बस गाडी में खड्ढे में जा गिरी!
यह अचेतन मन की प्रक्रिया है। हम बहुत बार अभ्यस्त हो जाते हैं। और जिसमें अभ्यस्त हो जाते हैं, उस पर से ध्यान हट जाता है। फिर मशीन की तरह हाथ काम करते हैं, दिमाग भी मशीन की तरह काम करने लग जाता है। फिर मोड आये कि नहीं आये... गाडी को दांये बांये मोडने के लिये हाथ अभ्यस्त हो जाते हैं। हम अपने जीवन को इसी तरह जीते हैं। हर कदम उठने से पहले उस कदम के परिणामों का चिंतन जरूरी है, यही जागरूकता है।

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

31. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

31. जटाशंकर         -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

मिस्टर जटाशंकर का व्यापार चल नहीं रहा था। कोई युक्ति समझ में आ नहीं रही थी। क्या करूँ कि मैं अतिशीघ्र करोड़पति बन जाऊँ! आखिर उसने अपना दिमाग लडाकर एक ठगी का कार्य करना प्रारंभ किया। बाबा का रूप धार लिया। बोलने में तो उस्ताद था ही। उसने स्वर्ग के टिकट बेचने प्रारंभ कर दिये। उसने वचन दिया सभी को कि जो भी इस टिकिट को खरीदेगा, उसे निश्चित रूप से स्वर्ग ही मिलेगा, भले उसने जिन्दगी में कितने ही पाप किये हों... न केवल पूर्व के किये गये पाप नष्ट हो जायेंगे बल्कि भविष्य में होने वाले पापों की सजा भी नहीं भुगतनी होगी। बस केवल एक टिकिट खरीदना होगा और मरते समय उसे यह टिकिट अपनी छाती पर रखना होगा।
लोगों को तो आनंद आ गया। मात्र 5000 रूपये में स्वर्ग का रिजर्वेशन! और क्या चाहिये! फिर पाप करने की छूट! लोगों में तो टिकिट खरीदने के लिये अफरातफरी मच गई। हजारों टिकट बिक गये।
बहुत बडी राशि एकत्र कर वह अपने आश्रम लौट रहा था।
उसकी कार फर्राटे भरती हुई दौड रही थी। जटाशंकर अतिप्रसन्न था कि मेरा आइडिया कितना सफल रहा। रूपये उसने बडे बडे बैगों में भरकर कार की डिक्की में रखवा दिये थे। घर जल्दी पहुँचने के भाव थे।
रास्ता थोडा टेढा था। बीच में जंगल भी था। घुमावदार रास्ते में उसकी गाडी तेजी से दौड रही थी। कि अचानक सामने एक मोड पर बीच रास्ते पर कुछ बडे बडे पत्थर पडे दिखाई दिये।
ड्राईवर को गाडी रोकनी पडी। अचानक चारों ओर से बंदूक और पिस्तौल ताने लोग कार पर हमला करने लगे। उन डाकुओं के सरदार ने बाबा जटाशंकर के पास जाकर उसकी गर्दन से पिस्तौल लगा कर कहा- बाबा! रूपयों के बैग जल्दी से मेरे हवाले कर दो। बहुत पैसा एकत्र किया है तुमने!
बाबा जटाशंकर घबराते हुए बोला- अरे! एक संत को तुम लूट रहे हो... तुम्हें खतरनाक दंड भोगना पडेगा। नरक मिलेगी नरक!
सरदार ने कहा- बाबा! उसकी तुम चिंता न करो! मैं नरक में जाने वाला नहीं हूँ! क्योंकि मैंने स्वर्ग का टिकट खरीद लिया है। आपने ही तो कहा था- भविष्य में कुछ भी पाप करो... तुम्हें स्वर्ग ही मिलेगा!
इसलिये बाबा! आप तो जल्दी से सारी राशि मेरे हवाले करो।
बाबा जटाशंकर अपनी ही बातों में फँस गया था।
स्वर्ग कोई और नहीं दे सकता। कोई टिकट नहीं होता! हम स्वयं ही अपना स्वर्ग या नरक तय करते हैं। हमारा आचरण ही हमें स्वर्ग या नरक ले जाता है।

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

30 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

30 जटाशंकर     -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.
जटाशंकर रोज अपने घर के पिछवाडे जाकर परमात्मा से हाथ जोड कर प्रार्थना करता- हे भगवान! कुछ चमत्कार दिखाओ! मैं रोज तुम्हारी पूजा करता हूँ! नाम जपता हूँ। फिर इतना दुखी क्यों हूँ!
भगवन् मुझे कुछ नहीं चाहिये। बस! थोडे बहुत रूपये चाहिये। कभी कृपा करो भगवन्! ज्यादा नहीं बस सौ रूपये भेज दो! कहीं से भेजो! आकाश से बरसाओ चाहे... पेड पर लटकाओ! मगर भेजो जरूर! रोज रोज नहीं, तो कम से कम एक बार तो भेजो! और भगवन् ध्यान रखना! मैं अपनी आन बान का पक्का आदमी हूँ। पूरे सौ भेजना! ज्यादा मुझे नहीं चाहिये। एक भी ज्यादा हुआ तो भी मैं नहीं रखूंगा। एक भी कम हुआ, तब भी नहीं रखूंगा। जहाँ से रूपया आयेगा, उसी दिशा में वापस भेज दूंगा। मगर कृपा करो! एक बार सौ रूपये बरसा दो भगवन्!
पडौस में रहने वाला घटाशंकर रोज उसकी यह प्रार्थना सुनता था। उसने सोचा- चलो.. इसकी एक बार परीक्षा कर ही लें। देखें... यह क्या करता है।
उसने हँसी मज़ाक में एक थैली में 99 रूपये के सिक्के डाले और शाम को जब जटाशंकर आँख बंद कर प्रार्थना कर रहा था तब उसने दीवार के पास छिप कर निन्याणवें रूपये की वह थैली उसके हाथ में फेंक दी।
थैली का वजन भांप कर तुरंत जटाशंकर ने अपनी आँखें खोली। इधर उधर देखा.. कोई नजर नहीं आया। नजर कोई कहाँ से आता क्योंकि घटाशंकर तो थैली फेंक कर छिप गया था। वह छिप कर सब देख रहा था।
जटाशंकर तो थैली पाकर फूला नहीं समा रहा था। उसने सोचा- अहा! भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली। मैं रोज मांगता था.. आज मेरी मांग लगता है पूरी हो गई है। भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा बढ गई।
उसने बुदबुदाते हुए कहा- लेकिन भगवान! आपको मेरी शर्त याद है न! पूरे सौ होने चाहिये। एक भी कम नहीं! एक भी ज्यादा नहीं! कम-ज्यादा हुए तो वापस लौटा दूंगा।
जटाशंकर ने वहीं बैठकर थैली खोलकर रूपये गिनने शुरू किये! रूपये 99 निकले। उसका चेहरा उतर गया।
दीवार की ओट में छिपा घटाशंकर सोच रहा था कि अब 99 ही है... थैली फेंक वापस जल्दी से!
जटाशंकर ने दुबारा गिनना शुरू किया- शायद पहले मेरी गणना में भूल हो गई हो। लेकिन दुबारा भी 99 ही निकले। अब 99 ही थे। सौ थे ही नहीं तो एक बार गिनो चाहे पचास बार गिनो... 99 कभी भी सौ नहीं हो सकते।
जटाशंकर बहुत विचार में पड गया। उसने सोचा- भगवान की गणना में भूल कैसे हो सकती है। मैंने 100 मांगे थे..तो 99 कैसे निकले! अब क्या करूँ! यह थैली मुझे वापस फेंकनी पडेगी। यह तो ठीक नहीं हुआ। पैसा पाने के बाद वापस खोना पडेगा। वह काफी देर तक थैली हाथ में लेकर बैठा रहा... सोचता रहा...बार बार पैसे रगड रगड कर गिनता रहा!
घटाशंकर दीवार के उस पार देख देख कर मुस्कुरा भी रहा था और थैली का इंतजार भी कर रहा था। वह मन ही मन जटाशंकर को कह रहा था- भैया! कितनी ही बार गिन ले- 99 ही है। क्योंकि यह थैली कोई भगवान ने नहीं भेजी, बल्कि मैंने भेजी है। अब तूं जल्दी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वापस फेंक! ताकि मुझे मेरी थैली मिले और काम पे लगूं! लेकिन वह चिन्ता भी कर रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि यह प्रतिज्ञा भूल जाय और थैली रख ले... मुझे सौ रूपयों का नुकसान हो जायेगा।
वह आँखें फाड कर देख रहा था।
जटाशंकर विचार करते करते अचानक राजी होते हुए बोला- अरे.. वाह भगवान! तुम भी क्या खूब हो.. पक्के बनिये हो। भेजे तो तुमने पूरे सौ रूपये! परंतु एक रुपया थैली का काटकर 99 रूपये रोकड भेज दिये! वाह भगवान वाह!
घटाशंकर ने अपना माथा पीट लिया।
सांसारिक स्वार्थ के लिये तर्क करना हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं! परन्तु अपनी बुद्धि का प्रयोग स्वयं के लिये अर्थात् अपनी आत्मा के लिये नहीं करते।

29 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

29 जटाशंकर          -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.
जटाशंकर की पत्नी ने अपने पति से कहा- लगता है! हमारा नौकर चोर है। हमें सावधान रहना होगा। जटाशंकर ने कहा- नौकर यदि चोर है तो उसकी छुट्टी कर देनी चाहिये।
ऐसे चोर का हमारे घर क्या काम? लगता है, इसके माता पिता ने इसे सुसंस्कार नहीं दिये।
लेकिन तुमने कैसे जाना कि वह चोर है। क्या चुराया उसने!
पत्नी ने कहा- अरे! अपने पाँच दिन पहले अपने मित्र द्वारा आयोजित भोजन समारंभ में गये थे न! वहाँ से दो चांदी के चम्मच अपन उठा कर नहीं लाये थे। वे चम्मच आज मिल नहीं रहे हैं। हो न हो! इसी ने चुराये होंगे। कैसा खराब आदमी है, चोरी करता है!
खुद ने चम्मच चोरी करके अपने झोले में डाले थे। अपनी यह चोर वृत्ति आनंद दे रही थी। कोई और चोरी करता है, दर्द होता है।
जीवन में हम इसी तरह का मुखौटा लगा कर जीते हैं। दूसरों की छोटी-सी विकृति पर बडा उपदेश देना बहुत आसान है। अपनी बडी विकृति पर दो आँसू बहाने बहुत मुश्किल है।

28 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

28 जटाशंकर       -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

पंडित घटाशंकर और ड्राइवर जटाशंकर स्वर्गवासी हुए। स्वर्ग और नरक का निर्णय करने वाले चित्रगुप्त के पास उन दोनों की आत्माऐं एक साथ पहुँची।
चित्रगुप्त अपने चौपडे लेकर उन दोनों के अच्छे बुरे कामों की सूची देखने लगे ताकि उन्हें नरक भेजा जाय या स्वर्ग, इसका निर्णय हो सके।
लेकिन चौपडों में इन दोनों जीवों का नाम ही नहीं था। चौपडा संभवत: बदल गया था। या फिर क्लर्क ने इधर उधर रख दिया था।
आखिर चित्रगुप्त ने उन दोनों से ही पूछना प्रारंभ किया कि तुमने काम क्या किये है, इस जन्म में! अच्छे या बुरे जो भी कार्य तुम्हारे द्वारा हुए हो, हमको बता दें। उसे सुन कर हम आपकी स्वर्ग या नरक गति का निर्णय कर सकेंगे।
पंडितजी ने कहना प्रारंभ किया- मैंने जीवन भर भगवान राम और कृष्ण की कथाऐं सुनाई है। सत्संग रचा है। मेरे कारण हजारों लोगों ने राम का नाम लिया है। इसलिये मेरा निवेदन है कि मुझे स्वर्ग ही भेजा जाना चाहिये।
वाहन चालक ने अपना निवेदन करते हुए कहा- मुझे भी स्वर्ग ही मिलना चाहिये। क्योंकि मेरे कारण भी लोगों ने लाखों बार राम का नाम लिया है।
पंडितजी ने कहा- वो कैसे ? राम का नाम तो मेरे कारण लोगों ने लिया है।
वाहन चालक ने कहा- पंडितजी! आपके कारण लोगों ने राम का नाम नहीं लिया है। राम का नाम तो मेरे कारण लिया है।
पंडितजी ने अपनी आँखें तरेरी!
वाहन चालक ने कहा- आप जब राम कथा करते थे तो अधिकतर लोग नींद लेते थे तो कहाँ से राम का नाम लेते। लेकिन मैं जब शराब पीकर डेढसौ की तीव्र गति से बस चलाता था तो सारे लोग आँख बंद कर मारे डर के राम का नाम लेना शुरू कर देते थे। जब तक बस नहीं रूकती, राम का नाम लेते ही रहते थे।
इसलिये हजूर! मैंने अपने जीवन में यह सबसे बडा कार्य किया है कि हजारों, लाखों लोगों को राम का नाम याद दिला देता था। इसलिये मुझे स्वर्ग ही मिलना चाहिये।
लोगों की दृष्टि बडी अजीब होती है। अपनी गलती होने पर भी मुस्कुराकर गलती न होने का अहसास दिलाते हैं और उसे भी दूसरों के लिये उपकारी बता कर प्रपंच रचते हैं। विकृत आचरण होने पर भी स्वर्ग की याचना करना, अपने साथ प्रवंचना करना है।

27 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

27 जटाशंकर      -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.
10 वर्षीय जटाशंकर एक बगीचे में घुस आया था। बगीचे के बाहर प्रवेश निषिद्ध का बोर्ड लगा था। फिर भी वह उसे नजर अंदाज करके एक पेड के नीचे खडे होकर फल बटोर रहा था। उसने बहुत सावधानी बरती थी कि चौकीदार कहीं उधर न आ जाये।
हाँलाकि उसने पहले काफी ध्यान दिया था कि चौकीदार वहाँ है या नहीं! आता है तो कब आता है... कब जाता है।
दीवार फाँद कर वह उतर तो गया था, पर कुछ ही देर बाद चौकीदार वहाँ आ गया था। उसने जटाशंकर को जब फल एकत्र करते देखा तो चौकीदार ने अपना डंडा घुमाया और जोर से चिल्लाया- क्या कर रहे हो? फल तोडते शर्म नहीं आती!
जटाशंकर घबराते हुए बोला- नही हुजूर! मैं तो ये फल जो नीचे गिर गये थे, इन्हें वापस चिपका रहा था।
चौकीदार गुस्से में चीखा- शर्म नहीं आती झूठ बोलते हुए! अभी चल मेरे साथ! तुम्हारे पिताजी से शिकायत करता हूँ। कहाँ है तुम्हारे पिताजी!
जटाशंकर हकलाते हुए बोला- जी! पिताजी तो इसी पेड पर चढे हुए हैं। उन्होंने ही तो सारे फल तोड कर नीचे गिराये हैं।
चौकीदार अचंभित हो उठा।
जहाँ पिताजी स्वयं अनैतिक कार्य करते हो, वहाँ पुत्र को क्या कहा जा सकता है। उसे संस्कारी बनाने की बात हवा में महल बनाने जैसी होगी। संस्कारों का प्रारंभ स्वयं से होता है।